ग़ाफ़िल की कलम से

कबाड़ा

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चन्द्र भूषण मिश्र 'ग़ाफ़िल'


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समझो बहार आई

Posted On: 16 Oct, 2013  
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पर ग़ज़ल गुनगुनाने को दिल चाहिए

Posted On: 10 Oct, 2013  
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बारहा दर-ब-दर पत्थर तलाशते हैं वो

Posted On: 12 Sep, 2012  
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बहुत बोले! करके दिखावो तो जानें!!

Posted On: 22 Mar, 2012  
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अन्ना दादा! वो भ्रष्टाचारी तो हम महाभ्रष्टाचारी

Posted On: 1 Mar, 2012  
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बौद्ध धर्म-दर्शन का मूलाधार-

Posted On: 24 Feb, 2012  
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ये बलात्कारी डॉक्टर!!

Posted On: 3 Feb, 2012  
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बाप रे! फिर चुनाव!!

Posted On: 25 Jan, 2012  
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उफ्!! ये चैनलिया बाबा!!!

Posted On: 24 Jan, 2012  
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लगता है चुनाव आ गया…

Posted On: 24 Jan, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: चन्द्र भूषण मिश्र 'ग़ाफ़िल' चन्द्र भूषण मिश्र 'ग़ाफ़िल'

भाई जी नेताओं में खोट मत निकालिए! पहले मैं भी निकालता था पर जब शालिनी जी के आलेख पर ध्यान गया तो एक सदमा सा लगा और यह काम करना बन्द कर दिया। हमारे जिस समस्या पर आप सब ने अपना अनमोल वक्त दिया और हमारे प्रति सहानुभूति दिखाई उसके लिए आभार पर अब हमने उस समस्या को ही समाप्त कर दिया सारा दोष अपने ऊपर लेते हुए। शालिनी जी का आलेख पढ़ा और मान लिया कि गल्ती किसी और की नहीं हमारी ही है। अगर कोई घूस लेता है तो वह उसका अधिकार है क्योंकि जड़ तो कहीं न कहीं हमीं में है। हमने ही उसे बोया तो काटेगा कौन? और हमने घूस दे दिया। अपना वेतन पास करा लिया। आप भी पढ़ें शालिनी जी का आलेख-http://cbmg.jagranjunction.com/2012/03/01/%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0/

के द्वारा: चन्द्र भूषण मिश्र 'ग़ाफ़िल' चन्द्र भूषण मिश्र 'ग़ाफ़िल'

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सादर नमस्कर! आप और मेरे जैसे लोगों को जब अपना काम निकलना होता हैं तो चाहते हैं कि किसी तरह से निकल जाएँ और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते चले जाते हैं.....छोडिये जो हुआ सो हुआ....चूँकि एक समस्या प्रत्यक्ष रूप से हमारे सामने आ चूँकि हैं तो इसका नितांत समाधान भी आवश्यक हैं. इस समस्या कि निंदा करने की बजे मैं अपने ब्लॉग साथियों से अपील करता हूँ कि इस समस्या का समाधान क्या निकला जाय. आख़िरकार समाधान की शुरुवात, हम लोगों को तो करना होगा ही. इसके साथ ही मैं Jagran Junction Forum से विनती करता हूँ कि दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पे कुछ चुनिन्दा ब्लागरों के आलेख को छापने के पक्षपात को छोड़कर ऐसी समस्याओं वाले ब्लॉग को सम्पादित करें ताकि समस्या सरकार ,प्रशासन और समाज के सामने स्पष्ट रूप से पहुँच सके.........हार्दिक आभार!

के द्वारा:

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चन्द्र भूषण मिश्र 'ग़ाफ़िल' जी सादर वंदेमातरम ! कल हिंदी पत्रकारिता के स्तंभ स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी जी का जन्मदिन था । मीडिया को खास कर इस दिन अपने कर्तव्यों और दायित्वों की तरफ भी आंख मंूद कर सोचना चाहिये । इनसे पूछिये कि आप ऐसे कार्यक्रम क्यों दिखाते हैं तो इनका टका सा जवाब होगा पब्लिक देखना चाहती है इसलिये बनाते हैं । यानी इस देश में जो बिकता है उसी से नैतिकता और पत्रकारिता के नये सिद्धांत गढ़े जायेंगे । मैं निवेदन करूंगा कि आम जनता न तो दार्शनिक होती है, न समाजशास्त्री होती है और न ही नीतिशास्त्र की ज्ञाता होती है । इंसान भी मूलतः जानवर होता है । मीडिया का काम है उसमे चेतना जागृत करना । राष्ट्रीय, सामाजिक, नैतिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, अध्यात्मिक चेतना । अभी उस पीढ़ी के बहुत से लोग जिंदा हैं जिन्होंने आजादी के पहले का भारत देखा था और आजादी के बाद का भी भारत देख रहे हैं । उनसे पूछिये तो कहेंगे कि इन काले अंग्रेजों से वो सफेद अंग्रेज कहीं अधिक बेहतर थे । आजादी के पूर्व की पत्रकारिता देखिये । उसका एक मात्र ध्येय देश की आजादी था । देश आजाद हुआ तो पत्रकारिता का ध्येय देश का निमार्ण हुआ । पर उदारिकरण के पश्चात जब से मीडिया में विदेशी पंूजी का निवेश हुआ मीडिया का नजरिया अपने सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना जगाने की जिम्मेदारी से हट कर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना हो गया । अब मीडिया बाजार द्वारा संचालित है और अपने विदेशी पार्टनर्स के द्वारा भी । अब भारत की मीडिया पर उसके विदेशी साझेदार दबाव बनाते हैं विदेशी संस्कृति के प्रचार प्रसार का । बाजार का न तो कोयी धर्म होता है, न ही नैतिकता और न ही कोयी राष्ट्र । उदारिकरण के बीस साल पूरे हो गये । आप देखिये नारी आज इंसान नहीं उपभोग की वस्तु है और नारी ने यह मान भी लिया है और वह अपना दाम वसूल रही है । विदेशी संस्कृति लिव इन रिलेशन, होमोसेक्सुएलिटी की वकालत आज मीडिया ही कर रहा है । संविधान का अनुच्छेद 19 (1)(क) वाक और अभिव्यक्ति की आजादी को बाजार ने अपने चंगुल में ले लिया है । किसी की हिम्मत नहीं है कि इनको 19 (2) में दिये गये अपवादों की भी याद दिलाये । 19 (2) में 8 अपवाद दिये गये हैं । 1. राज्य की सुरक्षा (सैयद अली शाह गिलानी और अरूंधती राय ने इस अपवाद का अभी कुछ दिन पहले उल्लंघन किया है) 2. विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंधों के हित में । 3. लोकव्यवस्था । 4. शिष्टाचार या सदाचार के हित में । 5. न्यायालय अवमानना । 6. मानहानि । 7. अपराध उद्दीपन के मामले में और 8. भारत की प्रभुता एवं अखण्डता । मीडिया आज यह सब भूल गया है । उसको सिर्फ अपनी टीआरपी, एड और अनुच्छेद 19 (1)(क) वाक और अभिव्यक्ति की आजादी से मतलब है । बाकी वह कुछ याद नहीं रखना चाहती । आभार ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra




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