ग़ाफ़िल की कलम से

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'मनोरंजन' के साथ खिलवाड़ : बदल रही परिभाषा

Posted On: 26 Oct, 2010 Others में

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‘मनोरंजन’ एक बहुआयामी शब्द, जिसकी विषय-वस्तु के अन्तर्गत वे सभी तत्त्व आते हैं जो मन को हल्का-फुल्का तथा प्रसन्न करके हमारे अन्दर नया उत्साह, नयी ऊर्जा का संचार कर सकते हैं। दिन भर की भागमभाग कार्य-पद्धति से ऊबा इंसान मनोरंजन हेतु सर्वाधिक सुलभ साधन समाचार पत्र या मीडिया के ऐसे ही किसी उपक्रम का सहारा लेता है, तो उसमें इस महत्त्वपूर्ण विषय के लिए निर्धारित कॉलम के अन्तर्गत उसे वस्तु स्वरूप मिलती हैं मात्र सिने जगत से सम्बन्धित कुछ ऊटपटांग ख़बरें अथवा अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के कामुक तथा उत्तेजक मुद्रा में कुछ दृश्य। क्या मनोरंजन का क्षेत्र इन्हीं व्यर्थ की चीजों तक सिमट कर रह गया है? आख़िर वे सारी विधाएँ जैसे गीत-ग़ज़ल, कविता-कहानियाँ, हास्य-व्यंग्य आदि, जो कभी इस शब्द की जान हुआ करती थीं, कहाँ पानी भरने चली गईं? कहते हैं कि शब्दों का ग़लत अथवा उसके सामर्थ्य को नज़रअंदाज कर बार-बार प्रयोग करने से वह अपनी मूल परिभाषा ही खो देता है। आने वाली पीढ़ी अगर मनोरंजन का अर्थ केवल सिनेमा, उससे जुड़ी तमाम अनर्गल ख़बर तथा अर्द्धनग्न सीन ही समझने लगे तो क्या बुरा? जब हमारा जिम्मेदार तबका मीडिया, जो कि शब्दों की ही खाता, शब्द ही ओढ़ता-बिछाता है, इस प्रकार शब्द की परिभाषा बदलने पर तुला है। अब मनोरंजन के कॉलम में गीत-ग़ज़ल, कविता-कहानियाँ, हास्य-व्यंग्य आदि जो मन की स्वस्थ रंजना करते हैं, नहीं होते। अब होते हैं मात्र सिनेमा से सम्बन्धित व्यर्थ प्रलाप। मीडिया द्वारा मनोरंजन के विशाल प्रांगण को जाने या अन्जाने धीरे-धीरे सिने जगत तक ही सिमटा देने का व्यापार तथा इस प्रकार शब्दों के साथ खिलवाड़ निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण और अक्षम्य है। पर महिमामण्डित तथा सर्वसमर्थ मीडिया, उसकी शान के खिलाफ़ कौन मुँह खोले। मीडिया भाई! नाराज़ न होना लेकिन सच यही है। या तो तुम भ्रम में हो या तो मुझ सीधी-सादी जनता को भ्रमित कर रहे हो। माफ करना तुम्हारे इस बलात्कारी उद्योग से यह प्यारा शब्द अपनी मूल प्रकृति ही न गवाँ बैठे।
-ग़ाफ़िल

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

urmila singh के द्वारा
19/09/2011

सूचनावर्धक आलेख.

साधना वैद के द्वारा
19/09/2011

हर बात से सहमत हूँ दरअसल टी वी चैनल्स पर जिस तरह की अपसंस्कृति परोसी जा रही है और मनोरंजन के नाम पर नैतिकता का ह्रास दिखाया जा रहा है वह चिंतनीय है अफ़सोस की बात यह है कि समाचार चैनल्स भी समाचार दिखाने की रस्म अदायगी के उपरान्त अधिकतर समय में इन्हीं सीरियल्स के दृश्य या फ़िल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों की चटपटी खबरें दिखाने में व्यस्त रहते हैं इन चैनल्स पर प्रभावी अंकुश एवं नियंत्रण की सख्त आवश्यकता है ताकि समाज को प्रदूषित होने से बचाया जा सके आपका आभार जो आपने इस संवेदनशील विषय को अपने आलेख के लिये चुना

kmmishra के द्वारा
28/10/2010

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ जी सादर वंदेमातरम ! कल हिंदी पत्रकारिता के स्तंभ स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी जी का जन्मदिन था । मीडिया को खास कर इस दिन अपने कर्तव्यों और दायित्वों की तरफ भी आंख मंूद कर सोचना चाहिये । इनसे पूछिये कि आप ऐसे कार्यक्रम क्यों दिखाते हैं तो इनका टका सा जवाब होगा पब्लिक देखना चाहती है इसलिये बनाते हैं । यानी इस देश में जो बिकता है उसी से नैतिकता और पत्रकारिता के नये सिद्धांत गढ़े जायेंगे । मैं निवेदन करूंगा कि आम जनता न तो दार्शनिक होती है, न समाजशास्त्री होती है और न ही नीतिशास्त्र की ज्ञाता होती है । इंसान भी मूलतः जानवर होता है । मीडिया का काम है उसमे चेतना जागृत करना । राष्ट्रीय, सामाजिक, नैतिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, अध्यात्मिक चेतना । अभी उस पीढ़ी के बहुत से लोग जिंदा हैं जिन्होंने आजादी के पहले का भारत देखा था और आजादी के बाद का भी भारत देख रहे हैं । उनसे पूछिये तो कहेंगे कि इन काले अंग्रेजों से वो सफेद अंग्रेज कहीं अधिक बेहतर थे । आजादी के पूर्व की पत्रकारिता देखिये । उसका एक मात्र ध्येय देश की आजादी था । देश आजाद हुआ तो पत्रकारिता का ध्येय देश का निमार्ण हुआ । पर उदारिकरण के पश्चात जब से मीडिया में विदेशी पंूजी का निवेश हुआ मीडिया का नजरिया अपने सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना जगाने की जिम्मेदारी से हट कर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना हो गया । अब मीडिया बाजार द्वारा संचालित है और अपने विदेशी पार्टनर्स के द्वारा भी । अब भारत की मीडिया पर उसके विदेशी साझेदार दबाव बनाते हैं विदेशी संस्कृति के प्रचार प्रसार का । बाजार का न तो कोयी धर्म होता है, न ही नैतिकता और न ही कोयी राष्ट्र । उदारिकरण के बीस साल पूरे हो गये । आप देखिये नारी आज इंसान नहीं उपभोग की वस्तु है और नारी ने यह मान भी लिया है और वह अपना दाम वसूल रही है । विदेशी संस्कृति लिव इन रिलेशन, होमोसेक्सुएलिटी की वकालत आज मीडिया ही कर रहा है । संविधान का अनुच्छेद 19 (1)(क) वाक और अभिव्यक्ति की आजादी को बाजार ने अपने चंगुल में ले लिया है । किसी की हिम्मत नहीं है कि इनको 19 (2) में दिये गये अपवादों की भी याद दिलाये । 19 (2) में 8 अपवाद दिये गये हैं । 1. राज्य की सुरक्षा (सैयद अली शाह गिलानी और अरूंधती राय ने इस अपवाद का अभी कुछ दिन पहले उल्लंघन किया है) 2. विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंधों के हित में । 3. लोकव्यवस्था । 4. शिष्टाचार या सदाचार के हित में । 5. न्यायालय अवमानना । 6. मानहानि । 7. अपराध उद्दीपन के मामले में और 8. भारत की प्रभुता एवं अखण्डता । मीडिया आज यह सब भूल गया है । उसको सिर्फ अपनी टीआरपी, एड और अनुच्छेद 19 (1)(क) वाक और अभिव्यक्ति की आजादी से मतलब है । बाकी वह कुछ याद नहीं रखना चाहती । आभार ।

    virendra sharma(veerubhai) के द्वारा
    19/09/2011

    भाई साहब !मीडिया अब एक निगम है .बाज़ार की सजावट है .निर्देशित शोध की तरह है मीडिया .दर्शक और पाठक बैंक है मीडिया .मनोरंजन का मतलब भौंडा चैनलिया हास्य है .नक़ल है कोंग्रेसी .उपवास है वाघेला का मनोरंजन ,लालू के मुंह मी बीड़ा और लालुवी होली पर ढोलक की थाप है मनोरंजन .

    Aryaman Chetas Pandey के द्वारा
    20/09/2011

    बिलकुल सही कहा है…


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