ग़ाफ़िल की कलम से

कबाड़ा

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यह शहरे-ग़ाफ़िल है

Posted On: 4 Nov, 2010 में

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यह शहरे-ग़ाफ़िल है, अदा भी निराली होगी,
वक़्ते-इस्तक़बाल, हर जुबान पे गाली होगी।
रुखे-ख़ुशामदीद ज़र्द नज़र आएगा,
और तो ठीक है बस बात ही जाली होगी॥

घर का दीवाला होगा, घर मेँ दीवाली होगी,
भरी दूकान होगी, जेब भर खाली होगी।
जिसकी दरकार जहाँ, होगा दरकिनार वही,
पुश्त मेँ बीवी और रू-ब-रू साली होगी॥

रोज़ होगा सियाह-वो- शब उजाली होगी,
दिखेगा सब्ज़ मग़र झमकती लाली होगी।
नहीँ मिसाल और होगा अहले दुनियाँ मेँ,
के कैश गोरा होगा लैला ही काली होगी॥
यह शहरे-ग़ाफ़िल है…

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" के द्वारा
29/06/2011

नहीँ मिसाल और होगा अहले दुनियाँ मेँ, के कैश गोरा होगा लैला ही काली होगी॥ — ग़ज़ल के सभी अशआर बहुत खूबसूरत हैं — वर्ड-वेरीफिकेशन क्यों।

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" के द्वारा
29/06/2011

नहीँ मिसाल और होगा अहले दुनियाँ मेँ, के कैश गोरा होगा लैला ही काली होगी॥ — ग़ज़ल के सभी अशआर बहुत खूबसूरत हैं — वर्ड-वेरीफिकेशन क्यों

Shalini Pandey के द्वारा
20/05/2011

वाह! क्या कहना

RaJ के द्वारा
05/11/2010

बहुत सुन्दर रचना बधाइयाँ आगे भी अच्छी रचना लिखते रहिये इस मंच पर jrajeev.jagranjunction.com


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