ग़ाफ़िल की कलम से

कबाड़ा

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बाप रे! फिर चुनाव!!

Posted On: 25 Jan, 2012 Others में

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बाप रे! फिर चुनाव!!…चौंकिए नहीं साहब! यह उलझन भारत की जनता की नहीं बल्कि चुनाव ड्यूटी में लगे कर्मचारियों की है। भई ड्यूटी करनी ही है तो उलझन क्यूं??… नहीं, उलझन है मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूँ। चुनाव ड्यूटी की सबसे बड़ी उलझन होती है कि हमें वाहन स्वरूप मिलेगा क्या? कभी कभार भाग्य साथ दे दिया तो सवारी-गाड़ी मिल जाती है नहीं तो अक्सर ही भार-वाहन यानी ट्रक ही चुनाव कर्मचारियों को नसीब होता है। ऐसी हालत में क्या दुर्गति होती है कर्मचारियों की इसे बयान नहीं किया जा सकता। वैसे भी भारत में आदमी की कीमत भूसे से ज्यादा नहीं है सो सरकार और अधिकारी जो शायद आदमी नहीं भगवान हैं और भारत में जनता के भाग्य-विधाता भी (ऐसा स्वीकार कर लिया गया है) की निगाह ही आदमियों के बावत क्यों बदले? इस सन्दर्भ में मैंने एक लेख लिखा था अक्टूबर 10 के होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की ड्यूटी से लौटने के उपरान्त इसी मंच पर।अबकी बार इलेक्शन ड्यूटी में जाने के पहले ही वह लेख आप लोगों को पढ़वाना समीचीन समझता हूँ, आप अवश्य क्लिक करें और पढ़ें-

भारत में चुनाव : कर्मचारी बनाम भूसा

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

डॉ. विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ के द्वारा
25/01/2012

आप सही कह रहे हैं पर भ्रष्टाचारी व्यवस्थ सुने तब न!!!

    ग़ाफ़िल के द्वारा
    25/01/2012

    आदरणीय शुक्ल जी आपका आभार

शालिनी पाण्डेय के द्वारा
25/01/2012

यथार्थ का वास्तविक चित्रण, पर इस भ्रष्टाचारी व्यवस्था में कौन सुनने वाला है आपकी बात। कुछ ट्रेडिशन बन जाती हैं फिर किसकी हिम्मत कि उसे तोड़े। और इसमें फ़ायदा ही है अधिकारियों का तो भला वो क्यूं ऐसा करेंगे? अपनी जूती अपना सिर भला कौन चाहेगा

    चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ के द्वारा
    25/01/2012

    आप सही कह रही हैं शालिनी जी! मेरा ऐसा लिखना और पत्थर पर सर पटकना दोनों समान है

abodhbaalak के द्वारा
25/01/2012

क्या बात है गाफिल साहब, आपने उन सरकारी अधिकारीयों के दर्द को बड़े ही सुन्दरता के साथ ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/


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